अब मैं तुम्हारा कश्मीर हूं……

अब मैं तुम्हारा कश्मीर हूं……

दुस्तान तेरे अस्तित्व की, बनती बिगड़ती तस्वीर हूँ ।
हक से अपनालों मुझें, अब मैं तुम्हारा कश्मीर हूँ l

बड़ी देर कर दी तुमने, मुझपर अपना हक जताने में ,
शान से तिरंगे को, मेरी वादियों में फहराने में,
बड़ी देर कर दी तुमने, मुझपर अपना हक जताने में ,
तुम स्वर्ग कहते हो मुझे, मैं वर्षों पुरानी पीर हूँ I
हक से अपनालों मुझें, अब मैं तुम्हारा कश्मीर हूँ l

तुम थे हमेशा से चौकन्ने , मेरी हिफ़ाज़त में खड़े,
कभी पत्थर तो कभी गोलियां, बड़े कष्ट तुम पर हैं पड़े,
तुम थे हमेशा से चौकन्ने, मेरी हिफ़ाज़त में खड़े,
तुम धैर्य से सवारना मुझे, क्योंकि मैं बड़ा अधीर हूँ I
हक से अपनालों मुझें, अब मैं तुम्हारा कश्मीर हूँ l

तीन सौ सत्तर की शर्तों से, तुमने मुक्त किया है मुझको,
हे हिन्द तुम हो भीष्म मेरे, कैसे शुक्रिया कहूँ तुझको,
तीन सौ सत्तर की शर्तों से, तुमने मुक्त किया है मुझको,
जिसकी फ़िक्र में तू व्याकुल था, मैं वो मुद्दा गंभीर हूँ।
हक से अपनालों मुझें, अब मैं तुम्हारा कश्मीर हूँ l

मेरे कश्मीर मेरी शान है तू, मेरा मान है, स्वाभिमान है तू,
मेरे मस्तक में सजा हुआ, केसर का तिलक है तू,
अभिन्न भारत की, अतुल्य झलक है तू,
हक से अपनाया है तुझें, हाँ मेरा कश्मीर है तू,
हाँ मेरा कश्मीर है तू, हाँ …. मेरा कश्मीर है तू।

– श्रुति द्विवेदी, अध्यापिका,
ग्रैडस इन्टरनेशनल स्कूल, ग्रेटर नोएडा

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