कॉलेज नहीं परिवार बनाएगा सुसंस्‍कारित बह ू

अनिल निगम

‘‘यत्र नार्यस्‍तु पूज्‍यन्‍ते, रमंते तत्र देवता’’ भारतीय संस्‍कृति का यह सूक्ति वाक्‍य भारतीय समाज और संस्‍कृति में महिलाओं की श्रेष्‍ठ स्थिति को दर्शाता है। इसी संदर्भ में एक खबर ने हम सभी का ध्‍यान आकर्षि‍त किया है जिसमें कहा गया है कि बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय (बीएचयू) अब महिलाओं को बहू बनने का प्रशिक्षण देगा। यह खबर हर नागरिक को न केवल चौकाती है, वरन इसका भारतीय जनमानस पर गंभीर असर पड़ता है। इस खबर से हमारे मन-मस्तिष्‍क में सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि आखिर हमें सफल बहू बनने के लिए समाज की मूल इकाई परिवार को छोड़कर कॉलेज में दाखिला लेने की जरूरत क्‍यों महसूस हुई है? क्‍या कॉलेज मात्र तीन महीने के कोर्स में एक लड़की को सफल बहू बनने के सभी गुर सिखा देगा? क्‍या ऐसे पाठ्यक्रमों को शिक्षा जगत में शामिल कर प्रोत्‍साहित किया जाना चाहिए?
बीएचयू ने यह कोर्स डाटर्स प्राइड यानि बेटी मेरा अभिमान नाम से पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। तीन महीने के इस पाठ्यक्रम में छात्राओं को आत्‍मविश्‍वास, इंटरपर्सनल कौशल, समस्‍याओं को हल करने की कला, मैरिज एवं स्‍ट्रेस स्किल्‍स और सामाजिकता इत्‍यादि गुण सिखाएं जाएंगे।

प्राचीन आर्य समाज में महिला को ‘जानि’ के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ जन्म देने वाली होता है। आगे चलकर यही शब्‍द ‘जननी’ शब्द बन गया।
परिवार के पुरुष और नारी दो स्‍तंभ होते हैं। उन्हीं के संयुक्त प्रयास से परिवार बनते और चलते हैं, लेकिन परिवार को सु‍व्‍यवस्‍थित रखने का उत्तरदायित्व नारी के ऊपर होता है। परिवार का संपूर्ण वातावरण उसी के आचार और व्‍यवहार पर निर्भर करता है।
भारतीय संस्‍कृति में नैतिकता सीखने की पहली पाठशाला परिवार को माना जाता है। पूर्व में संयुक्‍त परिवार की परंपरा थी। माता-पिता के अलावा चाचा, चाची, दादा, दादी, नाती, पोते इत्‍यादि के एक छत के नीचे रहते थे। लेकिन अब संयुक्त परिवारों का अस्तित्‍व धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। नई पीढ़ी की अकेले और स्वच्छंद रहने की इच्छा और आधुनिक लाइफ स्टाइल की प्रवृत्ति संयुक्त परिवार के टूटने का प्रमुख कारण हैं। आज की युवा पीढ़ी माता-पिता, दादा-दादी के प्रति आदर, सम्मान और सुसभ्य व्यवहार करना भूल सी गई है। संयुक्‍त परिवारों के टूटने से परिवारिक समरसता में कमी आई है। सभी अपनी-अपनी धुन में रमते हुए जीवन शैली को ढालने में मशगूल हैं। हर व्यक्ति इतना व्यस्त हो गया है कि उसके पास सोशल मीडिया-व्‍हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर इत्‍यादि के लिए तो समय है, पर घर के बुज़ुर्गों के पास दो पल बैठकर प्यार से बातें करने और उनका हाल-चाल पूछने का समय नहीं है।

संयुक्‍त परिवारों के बिखराव के साथ ही नैतिकता, सामाजिक नियमों व कानूनों, रहन-सहन में भी बहुत बदलाव आ चुका है। संयुक्त परिवारों के मज़बूत स्तंभों के ढहते ही समाज का सारा ढांचा तहस-नहस हो गया है। अनेक परंपराएं और रीति-रिवाज समाप्‍त हो चुके हैं। ऐसा होने से हमारी संस्कृति को गंभीर आघात पहुंचा है। एकल परिवारों की बढ़ती प्रव़त्ति और संयुक्त परिवारों में बिखराव आने से हमारी संस्‍कृति पर पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति हावी होती जा रही है। निस्‍संदेह इसके कारण हमारे समाज में महिलाओं की भूमिका और स्थिति में भी बदलाव आया है।
मुझे यह बात कहने में कोई गुरेज नहीं है कि संयुक्त परिवार के टूटने से यदि किसी का सर्वाधिक लाभ और नुकसान हुआ है तो वह महिला है। संयुक्त परिवार में महिलाएं पुरुष की चौधराहट से खुद को दबा हुआ महसूस करती थीं। उनके अधिकारों का हनन होता था, पर अब वे अपनी मर्जी से स्‍वतंत्रतापूर्वक अपना जीवन यापन कर सकती हैं। उनको पुरुषों के ही समान अधिकार मिल गए ह हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि कई मामलों में नारी की स्वतंत्रता स्‍वछंदता में परिवर्तित हो गई है। वह फ़ैशन और ग्लैमर में डूबती चली गई और वह अपनी सभ्यता और संस्कृति से दूर होती चली गई।
स्‍वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि परिवार के लिए नारी शक्ति स्वरूपा है। घर-परिवार का पूरा वातावरण उसी के आचरण पर निर्भर करता है। नारी जन्मदात्री है। बच्चों का प्रजनन ही नहीं, पालन-पोषण भी उसके हाथ में है। मां बच्चों को बचपन से ही संस्‍कार देती है। महिला संयुक्‍त परिवार में मां, बहू, बहन, बुआ, मासी, दादी के रूप में अहम भूमिका निभाती रही है। इसी परिवार में लड़की को विभिन्‍न रिश्‍ते एक अच्‍छी और सुसंस्‍कारित बहू बनने का लंबा प्रशिक्षण भी देते हैं। उसे जिस कौशल में उसकी मां और दादी अनेक वर्षों तक पारंगत करती थीं, उसे आज कॉलेज सिर्फ तीन महीने में सिखा कर अच्‍छी बहू बना देगा, इस पर सवाल उठना स्‍वाभाविक है। मैं यह तो नहीं कहता कि बीएचयू जो पाठ्यक्रम शुरू करने जा रहा है, वह नहीं चलाया जाना चाहिए और मैं यह भी नहीं कह रहा कि संयुक्‍त परिवार की परंपरा को समाज पर फिर से थोप दिया जाए। पर मैं समाज के बुद्धिजीवियों और इस पाठ्यक्रम के निर्माताओं एवं संचालकों का इस बात के लिए आह्वान अवश्‍य करना चाहता हूं कि वे प्रशिक्षित की जाने वाली छात्राओं का ऐसा विकास करें ताकि वे एक सभ्‍य एवं सुसंस्‍कृ‍त नारी बन सकें। (लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)

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